श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 11: परमाणु से काल की गणना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
त्रसरेणुत्रिकं भुङ्क्ते य: काल: स त्रुटि: स्मृत: ।
शतभागस्तु वेध: स्यात्तैस्त्रिभिस्तु लव: स्मृत: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
त्रसरेणु-त्रिकम्—तीन षट् परमाणुओं का संयोग; भुङ्क्ते—जब वे संयुक्त होते हैं; य:—जो; काल:—काल की अवधि; स:— वह; त्रुटि:—त्रुटि; स्मृत:—कहलाती है; शत-भाग:—एक सौ त्रुटियाँ; तु—लेकिन; वेध:—वेध नाम से; स्यात्—यदि ऐसा होता है; तै:—उनके द्वारा; त्रिभि:—तीन गुना; तु—लेकिन; लव:—लव; स्मृत:—ऐसा कहलाता है ।.
 
अनुवाद
 
 तीन त्रसरेणुओं के समुच्चयन में जितना समय लगता है, वह त्रुटि कहलाता है और एक सौ त्रुटियों का एक वेध होता है। तीन वेध मिलकर एक लव बनाते हैं।
 
तात्पर्य
 यह गणना की गई है कि यदि एक सेंकड के १६८७.५ भाग किये जाँय तो हर भाग एक त्रुटि की अवधि है, जो कि अठारह परमाणु कणों के समुच्चयन का काल है। विभिन्न पिण्डों में परमाणुओं का ऐसा समुच्चयन भौतिक काल की गणना को जन्म देता है। इन विभिन्न अवधियों की गणना के लिए सूर्य केन्द्रबिन्दु है।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥