श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
गृहाणैतानि नामानि स्थानानि च सयोषण: ।
एभि: सृज प्रजा बह्वी: प्रजानामसि यत्पति: ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
गृहाण—स्वीकार करो; एतानि—इन सारे; नामानि—विभिन्न नामों को; स्थानानि—तथा स्थानों को; च—भी; स-योषण:— पत्नियों समेत; एभि:—उनके द्वारा; सृज—उत्पन्न करो; प्रजा:—सन्तानें; बह्वी:—बड़े पैमाने पर; प्रजानाम्—जीवों के; असि— तुम हो; यत्—क्योंकि; पति:—स्वामी ।.
 
अनुवाद
 
 हे बालक, अब तुम अपने तथा अपनी पत्नियों के लिए मनोनीत नामों तथा स्थानों को स्वीकार करो और चूँकि अब तुम जीवों के स्वामियों में से एक हो अत: तुम व्यापक स्तर पर जनसंख्या बढ़ा सकते हो।
 
तात्पर्य
 रुद्र के पिता के रूप में ब्रह्मा ने अपने पुत्र के लिए पत्नियाँ, उसके लिए वासस्थान तथा उसके नामों का भी चयन किया। यह स्वाभाविक है कि पुत्र अपने पिता द्वारा चुनी गई पत्नी को स्वीकार करे जिस तरह वह अपने पिता द्वारा रखे नाम को या पिता द्वारा प्रदत्त सम्पत्ति को स्वीकार करता है। संसार की जनसंख्या बढ़ाने का यह सामान्य तरीका है। दूसरी ओर चारों कुमार हैं जिन्होंने अपने पिता की भेंट स्वीकार नहीं की, क्योंकि वे बहुत से पुत्र उत्पन्न करने के कार्य की अपेक्षा बहुत उच्च पद पर थे। जिस तरह पुत्र उच्च उद्देश्य के लिए अपने पिता के आदेश को अस्वीकार कर सकता है उसी तरह पिता उच्च उद्देश्य के लिए जनसंख्या बढ़ाने में अपने पुत्रों का पालन करने से इनकार कर सकता है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥