श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
तपसैव परं ज्योतिर्भगवन्तमधोक्षजम् ।
सर्वभूतगुहावासमञ्जसा विन्दते पुमान् ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
तपसा—तपस्या से; एव—एकमात्र; परम्—परम; ज्योति:—प्रकाश; भगवन्तम्—भगवान् को; अधोक्षजम्—वह जो इन्द्रियों की पहुँच के परे है; सर्व-भूत-गुहा-आवासम्—सारे जीवों के हृदय में वास करने वाले; अञ्जसा—पूर्णतया; विन्दते—जान सकता है; पुमान्—मनुष्य ।.
 
अनुवाद
 
 एकमात्र तपस्या से उन भगवान् के भी पास पहुँचा जा सकता है, जो प्रत्येक जीव के हृदय के भीतर हैं किन्तु साथ ही साथ समस्त इन्द्रियों की पहुँच के बाहर हैं।
 
तात्पर्य
 ब्रह्मा ने रुद्र को तपस्या करने के लिए सलाह दी जो उनके पुत्रों तथा अनुयायियों के लिए उदाहरणस्वरूप थी कि भगवान् की कृपा पाने के लिए तपस्या आवश्यक है। भगवद्गीता में कहा गया है कि सामान्य जन महाजनों द्वारा दिखाये गये पथ का अनुसरण करते हैं। इस तरह रुद्र की सन्तानों से ऊबकर तथा जनसंख्या के बढऩे से निगले जाने से भयभीत होकर ब्रह्मा ने रुद्र से और अधिक अवांछित सन्तानें उत्पन्न न करने तथा परमेश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए तपस्या करने की सलाह दी। अतएव चित्रों में हम देखते हैं कि रुद्र सदैव भगवान् की कृपा पाने के लिए ध्यानावस्थित रहते हैं। अप्रत्यक्ष रूप से रुद्र के पुत्रों तथा अनुयायियों को सलाह दी जा सकती है कि रुद्र तत्त्व का अनुसरण न करते हुए संहार कार्य बन्द कर दें जब कि ब्रह्मा की शान्तिपूर्ण सृष्टि हो रही हो।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥