श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक
ससर्जाग्रेऽन्धतामिस्रमथ तामिस्रमादिकृत् ।
महामोहं च मोहं च तमश्चाज्ञानवृत्तय: ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
ससर्ज—उत्पन्न किया; अग्रे—सर्वप्रथम; अन्ध-तामिस्रम्—मृत्यु का भाव; अथ—तब; तामिस्रम्—हताशा पर क्रोध; आदि- कृत्—ये सभी; महा-मोहम्—भोग्य वस्तुओं का स्वामित्व; च—भी; मोहम्—भ्रान्त धारणा; च—भी; तम:—आत्मज्ञान में अंधकार; च—भी; अज्ञान—अविद्या; वृत्तय:—पेशे, वृत्तियाँ ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्मा ने सर्वप्रथम आत्मप्रवंचना, मृत्यु का भाव, हताशा के बाद क्रोध, मिथ्या स्वामित्व का भाव तथा मोहमय शारीरिक धारणा या अपने असली स्वरूप की विस्मृति जैसी अविद्यापूर्ण वृत्तियों की संरचना की।
 
तात्पर्य
 विभिन्न प्रकार की योनियों में जीवों की वास्तविक सृष्टि के पूर्व ब्रह्मा ने वे परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं जिनके अन्तर्गत जीवों को इस भौतिक जगत में रहना होता है। जब तक जीव अपने असली स्वरूप को भूल नहीं जाता तब तक जीवन की भौतिक अवस्थाओं में रह पाना उसके लिए असम्भव है। अतएव भौतिक जीवन की पहली दशा है अपने असली स्वरूप की विस्मृति। अपने असली स्वरूप को भूलने पर मनुष्य का मृत्यु से भयभीत होना निश्चित है, यद्यपि शुद्ध आत्मा मृत्युरहित तथा जन्मरहित होता है। भौतिक प्रकृति के साथ यह झूठी पहचान उन वस्तुओं के मिथ्या स्वामित्व का कारण है, जो श्रेष्ठ नियंत्रण की व्यवस्था द्वारा प्रदत्त होती हैं। जीव को समस्त भौतिक संसाधन इसलिए प्रदान किये जाते हैं कि वह शान्तिपूर्वक रह सके और बद्धजीवन में आत्म-साक्षात्कार के कर्तव्यों को निभा सके। किन्तु झूठी पहचान के कारण बद्धजीव भगवान् की सम्पत्ति के झूठे स्वामित्व के भाव में बन्धक हो जाता है। इस श्लोक से यह स्पष्ट है कि स्वयं ब्रह्मा परमेश्वर की सृष्टि हैं और भौतिक जगत की पाँच प्रकार की अविद्याएँ, जो जीवों को बद्ध बनाती हैं वे ब्रह्मा की सृष्टियाँ हैं। यह सोचना नितान्त हास्यास्पद है कि जीव परम पुरुष के तुल्य है, जबकि वह यह समझ सकता है कि बद्धजीव ब्रह्मा की जादुई छड़ी के वश में हैं। पतञ्जलि भी यह स्वीकार करते हैं कि अविद्या पाँच प्रकार की है जिनका यहाँ पर उल्लेख हुआ है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥