श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक
उत्सङ्गान्नारदो जज्ञे दक्षोऽङ्गुष्ठात्स्वयम्भुव: ।
प्राणाद्वसिष्ठ: सञ्जातो भृगुस्त्वचि करात्क्रतु: ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
उत्सङ्गात्—दिव्य विचार-विमर्श से; नारद:—महामुनि नारद; जज्ञे—उत्पन्न किया गया; दक्ष:—दक्ष; अङ्गुष्ठात्—अँगूठे से; स्वयम्भुव:—ब्रह्मा के; प्राणात्—प्राणवायु से या श्वास लेने से; वसिष्ठ:—वसिष्ठ; सञ्जात:—उत्पन्न हुआ; भृगु:—भृगु, मुनि; त्वचि—स्पर्श से; करात्—हाथ से; क्रतु:—क्रतु मुनि ।.
 
अनुवाद
 
 नारद ब्रह्मा के शरीर के सर्वोच्च अंग मस्तिष्क से उत्पन्न पुत्र हैं। वसिष्ठ उनकी श्वास से, दक्ष अँगूठे से, भृगु उनके स्पर्श से तथा क्रतु उनके हाथ से उत्पन्न हुए।
 
तात्पर्य
 नारद ब्रह्मा के सर्वोच्च विचार-विमर्श से उत्पन्न हुए थे, क्योंकि नारद जिसे भी चाहते उसी को परमेश्वर प्रदान कर सकते थे। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को कितने भी वैदिक ज्ञान के द्वारा या कितनी भी तपस्या के द्वारा अनुभव नहीं किया जा सकता। किन्तु नारद जैसा शुद्ध भगवद्भभक्त अपनी सदिच्छा द्वारा परमेश्वर प्रदान करा सकता है। नारद नाम से यह सुझाव मिलता है कि वे परमेश्वर प्रदान करा सकते हैं। नार का अर्थ है “परमेश्वर” तथा द का अर्थ है “जो प्रदान कर सके।” वह भगवान् को
प्रदान कर सकता है का अर्थ यह कदापि नहीं कि भगवान् कोई व्यापारिक वस्तु के सदृश हैं जिसे किसी भी व्यक्ति को प्रदान किया जा सकता है। किन्तु नारद किसी को भी भगवान् के दास, मित्र, माता-पिता या प्रेमी के रूप में भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति प्रदान करा सकते हैं जैसी भी चाह कोई व्यक्ति अपने दिव्य भगवत्प्रेम के कारण कर सके। दूसरे शब्दों में, एकमात्र नारद ही ऐसे हैं, जो भक्तियोग का मार्ग प्रदान कर सकते हैं, जो कि परमेश्वर की प्राप्ति के लिए सर्वोच्च योगिक साधन है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥