श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक
हृदि कामो भ्रुव: क्रोधो लोभश्चाधरदच्छदात् ।
आस्याद्वाक्सिन्धवो मेढ्रान्निऋर्ति: पायोरघाश्रय: ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
हृदि—हृदय से; काम:—काम; भ्रुव:—भौंहों से; क्रोध:—क्रोध; लोभ:—लालच; च—भी; अधर-दच्छदात्—ओठों के बीच से; आस्यात्—मुख से; वाक्—वाणी; सिन्धव:—समुद्र; मेढ्रात्—लिंग से; निरृति:—निम्न कार्य; पायो:—गुदा से; अघ- आश्रय:—सारे पापों का आगार ।.
 
अनुवाद
 
 काम तथा इच्छा ब्रह्मा के हृदय से, क्रोध उनकी भौंहों के बीच से, लालच उनके ओठों के बीच से, वाणी की शक्ति उनके मुख से, समुद्र उनके लिंग से तथा निम्न एवं गर्हित कार्यकलाप समस्त पापों के स्रोत उनकी गुदा से प्रकट हुए।
 
तात्पर्य
 बद्ध आत्मा मानसिक चिन्तन के वशीभूत रहता है। कोई संसारी शिक्षा एवं विद्वत्ता के आकलन में कितना ही बड़ा क्यों न हो, वह मनोवैज्ञानिक कार्यकलापों के प्रभाव से कभी भी मुक्त नहीं हो सकता। अतएव निम्न कार्यों के लिए कामवासना तथा इच्छाओं को तब तक त्याग पाना अतीव कठिन है जब तक कोई भगवद्भक्ति की परम्परा में न हो। जब कोई कामवासना तथा निम्न इच्छाओं से हताश होता है, तो मन में क्रोध उत्पन्न होता है, जिसकी अभिव्यक्ति भौहों के मध्य में होती है। इसलिए सामान्य लोगों को सलाह दी जाती है कि वे अपने मन को भौहों के मध्य के स्थान में केन्द्रित करें जबकि भगवद्भक्तों को अपने मन के आसन में भगवान् को स्थापित करने का अभ्यास रहता है। इच्छाविहीन होने का सिद्धान्त व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि मन को इच्छारहित नहीं बनाया जा सकता है। जब यह संस्तुति की जाती है कि मनुष्य इच्छाविहीन बने तो यह समझा जाता है कि मनुष्य को ऐसी चीजों की इच्छा नहीं करनी चाहिए जो आध्यात्मिक मूल्यों का ध्वंस करने वाली हों। भगवद्भक्त सदैव अपने मन में भगवान् को धारण करता है। इस तरह उसे इच्छाविहीन होने की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि उसकी सारी आवश्यकताएँ भगवान् की सेवा के सम्बन्ध में होती हैं। बोलने की शक्ति सरस्वती या विद्या की देवी कहलाती है और विद्या की देवी का जन्म स्थान ब्रह्मा का मुख है। भले ही मनुष्य को विद्या की देवी की कृपा प्राप्त हो, किन्तु उसका हृदय कामवासना तथा भौतिक इच्छा से पूर्ण हो सकता है और उसकी भौंहें क्रोध के लक्षण प्रकट कर सकती हैं। कोई सांसारिक दृष्टि से अत्यन्त विद्वान क्यों न हो, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि वह कामवासना तथा क्रोध के सारे निम्न कार्यों से मुक्त है। केवल शुद्ध भक्त से अच्छे गुणों की आशा की जा सकती है, क्योंकि वह भगवान् के विचारों में या श्रद्धासहित समाधि में सदैव लीन रहता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥