श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
तमधर्मे कृतमतिं विलोक्य पितरं सुता: ।
मरीचिमुख्या मुनयो विश्रम्भात्प्रत्यबोधयन् ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उस; अधर्मे—अनैतिकता में; कृत-मतिम्—ऐसे मन वाला; विलोक्य—देखकर; पितरम्—पिता को; सुता:—पुत्रों ने; मरीचि-मुख्या:—मरीचि इत्यादि; मुनय:—मुनिगण; विश्रम्भात्—आदर सहित; प्रत्यबोधयन्—निवेदन किया ।.
 
अनुवाद
 
 अपने पिता को अनैतिकता के कार्य में इस प्रकार मुग्ध पाकर मरीचि इत्यादि ब्रह्मा के सारे पुत्रों ने अतीव आदरपूर्वक यह कहा।
 
तात्पर्य
 मरीचि जैसे ऋषि द्वारा अपने महान् पिता के कार्यों के विरुद्ध विरोध प्रकट करने में कोई त्रुटि नहीं थी। वे भलीभाँति जानते थे कि यद्यपि उनके पिता ने त्रुटि की है, किन्तु इस घटना के पीछे कोई न कोई बड़ा कारण रहा होगा अन्यथा इतना महान् पुरुष ऐसी त्रुटि नहीं कर सकता था। हो सकता है कि ब्रह्माजी अपने अधीनस्थों को स्त्रियों से व्यवहार करते समय मानव दुर्बलताओं के प्रति आगाह करना चाह रहे हों। आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर चलने वाले पुरुषों के लिए यह सदैव अत्यन्त घातक है। अत: ब्रह्मा जैसे महापुरुष जब त्रुटि करते हैं तब न तो उनकी उपेक्षा करनी चाहिए न ही मरीचि जैसे महर्षि उनके असामान्य आचरण के कारण उनके प्रति किसी प्रकार का अनादर प्रदर्शित कर सके थे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥