श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक
नैतत्पूर्वै: कृतं त्वद्ये न करिष्यन्ति चापरे ।
यस्त्वं दुहितरं गच्छेरनिगृह्याङ्गजं प्रभु: ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
न—कभी नहीं; एतत्—ऐसी वस्तु; पूर्वै:—किसी पूर्व कल्प में अन्य किसी ब्रह्मा द्वारा या तुम्हारे द्वारा; कृतम्—सम्पन्न; त्वत्— तुम्हारे द्वारा; ये—वह जो; न—न तो; करिष्यन्ति—करेंगे; च—भी; अपरे—अन्य कोई; य:—जो; त्वम्—तुम; दुहितरम्—पुत्री के प्रति; गच्छे:—जायेगा; अनिगृह्य—अनियंत्रित होकर; अङ्गजम्—कामेच्छा; प्रभु:—हे पिता ।.
 
अनुवाद
 
 हे पिता, आप जिस कार्य में अपने को उलझाने का प्रयास कर रहे हैं उसे न तो किसी अन्य ब्रह्मा द्वारा न किसी अन्य के द्वारा, न ही पूर्व कल्पों में आपके द्वारा, कभी करने का प्रयास किया गया, न ही भविष्य में कभी कोई ऐसा दुस्साहस ही करेगा। आप ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च प्राणी हैं, अत: आप अपनी पुत्री के साथ संभोग क्यों करना चाहते हैं और अपनी इच्छा को वश में क्यों नहीं कर सकते?
 
तात्पर्य
 ब्रह्मा का पद ब्रह्माण्ड में सर्वोच्च पद है और ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रह्मा अनेक हैं और जिस ब्रह्माण्ड में हम रह रहे हैं इसके अतिरिक्त अनेक ब्रह्माण्ड हैं। इस पद पर स्थित रहनेवाले का आचरण
आदर्श होना चाहिए, क्योंकि ब्रह्मा सारे जीवों के लिए आदर्श प्रस्तुत करते हैं। सर्वाधिक पवित्र तथा आध्यात्मिक दृष्टि से उच्चस्थ जीव ब्रह्मा को भगवान् के बाद का पद प्रदान किया गया है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥