श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक
तस्मै नमो भगवते य इदं स्वेन रोचिषा ।
आत्मस्थं व्यञ्जयामास स धर्मं पातुमर्हति ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मै—उसे; नम:—नमस्कार; भगवते—भगवान् को; य:—जो; इदम्—इस; स्वेन—अपने; रोचिषा—तेज से; आत्म-स्थम्— अपने में ही स्थित; व्यञ्जयाम् आस—प्रकट किया है; स:—वह; धर्मम्—धर्म की; पातुम्—रक्षा करने के लिए; अर्हति—ऐसा करे ।.
 
अनुवाद
 
 हम उन भगवान् को सादर नमस्कार करते हैं जिन्होंने आत्मस्थ होकर अपने ही तेज से इस ब्रह्माण्ड को प्रकट किया है। वे समस्त कल्याण हेतु धर्म की रक्षा करें!
 
तात्पर्य
 संभोग के लिए कामेच्छा इतनी प्रबल होती है कि यहाँ पर ऐसा लगता है कि ब्रह्मा को मरीचि जैसे उनके महान् पुत्र अपनी याचना के बावजूद भी उनके संकल्प से विरत नहीं कर पाये। अत: इन महान् पुत्रों ने ब्रह्मा की सद्बुद्धि के लिए भगवान् से प्रार्थना करना शुरू कर दिया। यह तो एकमात्र भगवान् की कृपा ही है, जिससे मनुष्य को कामेच्छाओं की लालसा से बचाया जा सकता है। भगवान् उन भक्तों को संरक्षण प्रदान करते हैं, जो उनकी दिव्य प्रेमाभक्ति में सदैव लगे रहते हैं और वे अपनी अहैतुकी कृपा से भक्त को उसके अकस्मात् पतन से बचा लेते हैं। अत: मरीचि जैसे ऋषियों ने भगवान् की कृपा के लिए प्रार्थना की और उनकी प्रार्थना फलदायी रही।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥