श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक
षोडश्युक्थौ पूर्ववक्त्रात्पुरीष्यग्निष्टुतावथ ।
आप्तोर्यामातिरात्रौ च वाजपेयं सगोसवम् ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
षोडशी-उक्थौ—यज्ञ के प्रकार; पूर्व-वक्त्रात्—पूर्वी मुँह से; पुरीषि-अग्निष्टुतौ—यज्ञ के प्रकार; अथ—तब; आप्तोर्याम- अतिरात्रौ—यज्ञ के प्रकार; च—तथा; वाजपेयम्—एक प्रकार का यज्ञ; स-गोसवम्—एक प्रकार का यज्ञ ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्मा के पूर्वी मुख से विभिन्न प्रकार के समस्त अग्नि यज्ञ (षोडशी, उक्थ, पुरीषि, अग्निष्टोम, आप्तोर्याम, अतिरात्र, वाजपेय तथा गोसव) प्रकट हुए।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥