श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक
वैखानसा वालखिल्यौदुम्बरा: फेनपा वने ।
न्यासे कुटीचक: पूर्वं बह्वोदो हंसनिष्क्रियौ ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
वैखानसा:—ऐसे मनुष्य जो सक्रिय जीवन से अवकाश लेकर अध-उबले भोजन पर निर्वाह करते हैं; वालखिल्य—वह जो अधिक अन्न पाने पर पुराने संग्रह को त्याग देता है; औदुम्बरा:—बिस्तर से उठकर जिस दिशा की ओर आगे जाने पर जो मिले उसी पर निर्वाह करना; फेनपा:—वृक्ष से स्वत: गिरे हुए फलों को खाकर रहने वाला; वने—जंगल में; न्यासे—संन्यास आश्रम में; कुटीचक:—परिवार से आसक्तिरहित जीवन; पूर्वम्—प्रारम्भ में; बह्वोद:—सारे भौतिक कार्यों को त्याग कर दिव्य सेवा में लगे रहना; हंस—दिव्य ज्ञान में पूरी तरह लगा रहने वाला; निष्क्रियौ—सभी प्रकार के कार्यों को बन्द करते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 वानप्रस्थ जीवन के चार विभाग हैं—वैखानस, वाल-खिल्य, औदुम्बर तथा फेनप। संन्यास आश्रम के चार विभाग हैं—कुटीचक, बह्वोद, हंस तथा निष्क्रिय। ये सभी ब्रह्मा से प्रकट हुए थे।
 
तात्पर्य
 वर्णाश्रम धर्म अर्थात् चार वर्णों तथा सामाजिक एवं आध्यात्मिक जीवन के चार आश्रमों का संस्थान आधुनिक युग की कोई नयी ईजाद नहीं है जैसाकि अल्पज्ञों का प्रस्ताव है। यह ऐसा संस्थान है, जिसकी स्थापना ब्रह्मा द्वारा सृष्टि के प्रारम्भ में की गई। इसकी पुष्टि भगवद्गीता से (४.१३) भी होती है—चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥