श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक
आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्तथैव च ।
एवं व्याहृतयश्वासन् प्रणवो ह्यस्य दहृत: ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
आन्वीक्षिकी—तर्क; त्रयी—तीन लक्ष्य जिनके नाम धर्म, अर्थ तथा मोक्ष हैं; वार्ता—इन्द्रियतृप्ति; दण्ड—विधि तथा व्यवस्था; नीति:—आचरण सम्बन्धी संहिता; तथा—भी; एव च—क्रमश:; एवम्—इस प्रकार; व्याहृतय:—भू: भुव: तथा स्व: नामक विख्यात स्तोत्र; च—भी; आसन्—उत्पन्न हुए; प्रणव:—ॐकार; हि—निश्चय ही; अस्य—उसका (ब्रह्मा का); दह्रत:—हृदय से ।.
 
अनुवाद
 
 तर्कशास्त्र विज्ञान, जीवन के वैदिक लक्ष्य, कानून तथा व्यवस्था, आचार संहिता तथा भू: भुव: स्व: नामक विख्यात मंत्र—ये सब ब्रह्मा के मुख से प्रकट हुए और उनके हृदय से प्रणव ॐकार प्रकट हुआ।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥