श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक
शब्दब्रह्मात्मनस्तस्य व्यक्ताव्यक्तात्मन: पर: ।
ब्रह्मावभाति विततो नानाशक्त्युपबृंहित: ॥ ४८ ॥
 
शब्दार्थ
शब्द-ब्रह्म—दिव्य ध्वनि; आत्मन:—परमेश्वर श्रीकृष्ण; तस्य—उनका; व्यक्त—प्रकट; अव्यक्त-आत्मन:—अव्यक्त का; पर:— दिव्य; ब्रह्मा—परम; अवभाति—पूर्णतया प्रकट; वितत:—वितरित करते हुए; नाना—विविध; शक्ति—शक्तियाँ; उपबृंहित:— से युक्त ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्मा दिव्य ध्वनि के रूप में भगवान् के साकार स्वरूप हैं, अतएव वे व्यक्त तथा अव्यक्त की धारणा से परे हैं। ब्रह्मा परम सत्य के पूर्ण रूप हैं और नानाविध शक्तियों से समन्वित हैं।
 
तात्पर्य
 ब्रह्मा का पद ब्रह्माण्ड भर में सबसे अधिक उत्तरदायित्वपूर्ण पद है। यह ब्रह्माण्ड के सर्वाधिक पूर्ण व्यक्ति को प्रदान किया जाता है। जब इस पद को ग्रहण करने के लिए उपयुक्त जीव नहीं मिलता तो भगवान् को स्वयं ब्रह्मा बनना पड़ता है। भौतिक जगत में ब्रह्मा भगवान् का पूर्ण प्रतिनिधित्व करते हैं और प्रणव अर्थात् दिव्य ध्वनि उन्हीं से आती है। इसीलिए वे विविध शक्तियों से समन्वित रहते हैं जिनसे ही इन्द्र, चन्द्र तथा वरुण जैसे सारे देवता प्रकट होते हैं। उनके दिव्य महत्त्व को कम नहीं आँका जाना चाहिए, यद्यपि उन्होंने अपनी ही पुत्री के साथ रमण करने की प्रवृत्ति प्रदर्शित की थी। ब्रह्मा द्वारा ऐसी प्रवृत्ति के प्रदर्शन का एक अभिप्राय है और उन्हें सामान्य जीव की तरह गर्हित या निन्दनीय नहीं मानना चाहिए।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥