श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक
ततोऽपरामुपादाय स सर्गाय मनो दधे ॥ ४९ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; अपराम्—अन्य; उपादाय—स्वीकार करके; स:—वह; सर्गाय—सृष्टि विषयक; मन:—मन; दधे—ध्यान दिया ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् ब्रह्मा ने दूसरा शरीर धारण किया जिसमें यौन जीवन निषिद्ध नहीं था और इस तरह वे आगे सृष्टि के कार्य में लग गये।
 
तात्पर्य
 ब्रह्मा का पहला शरीर दिव्य था जिसमें यौनजीवन के प्रति अनुरक्ति वर्जित थी, अतएव यौन से सम्बद्ध होने के लिए उन्हें दूसरा शरीर अंगीकार करना पड़ा। इस तरह उन्होंने सृजन कार्य में अपने को लगाया। उनका पूर्व शरीर कुहरे में बदल गया जैसाकि पहले वर्णन हो चुका है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥