श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक
ऋषीणां भूरिवीर्याणामपि सर्गमविस्तृतम् ।
ज्ञात्वा तद्‍धृदये भूयश्चिन्तयामास कौरव ॥ ५० ॥
 
शब्दार्थ
ऋषीणाम्—ऋषियों का; भूरि-वीर्याणाम्—अत्यधिक पराक्रम से; अपि—के बावजूद; सर्गम्—सृष्टि; अविस्तृतम्—विस्तृत नहीं; ज्ञात्वा—जानकर; तत्—वह; हृदये—हृदय में; भूय:—पुन; चिन्तयाम् आस—विचार करने लगा; कौरव—हे कुरुपुत्र ।.
 
अनुवाद
 
 हे कुरुपुत्र, जब ब्रह्मा ने देखा कि अत्यन्त वीर्यवान ऋषियों के होते हुए भी जनसंख्या में पर्याप्त वृद्धि नहीं हुई तो वे गम्भीरतापूर्वक विचार करने लगे कि जनसंख्या किस तरह बढ़ायी जाय।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥