श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक
एवं युक्तकृतस्तस्य दैवञ्चावेक्षतस्तदा ।
कस्य रूपमभूद् द्वेधा यत्कायमभिचक्षते ॥ ५२ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; युक्त—सोच विचार करते; कृत:—ऐसा करते हुए; तस्य—उसका; दैवम्—दैवी शक्ति; च—भी; अवेक्षत:—देखते हुए; तदा—उस समय; कस्य—ब्रह्माण्ड; रूपम्—स्वरूप; अभूत्—प्रकट हो गया; द्वेधा—दोहरा; यत्—जो है; कायम्—उसका शरीर; अभिचक्षते—कहा जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 जब वे इस तरह विचारमग्न थे और अलौकिक शक्ति को देख रहे थे तो उनके शरीर से दो अन्य रूप उत्पन्न हुए। वे अब भी ब्रह्मा के शरीर के रूप में विख्यात हैं।
 
तात्पर्य
 ब्रह्मा के शरीर से दो शरीर उत्पन्न हुए। एक के मूच्छ थे और दूसरे के उभरे हुए वक्षस्थल। कोई भी उनके प्राकट्य के स्रोत को नहीं बतला सकता। इसीलिए आज भी वे कायम् कहलाते हैं जिसका अर्थ है ब्रह्मा का शरीर। इससे उनके पुत्र या पुत्री के रूप में उनके सम्बन्ध की कोई जानकारी नहीं मिलती।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥