श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक
स चापि शतरूपायां पञ्चापत्यान्यजीजनत् ।
प्रियव्रतोत्तानपादौ तिस्र: कन्याश्च भारत ।
आकूतिर्देवहूतिश्च प्रसूतिरिति सत्तम ॥ ५६ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह (मनु); च—भी; अपि—कालान्तर में; शतरूपायाम्—शतरूपा में; पञ्च—पाँच; अपत्यानि—सन्तानें; अजीजनत्— उत्पन्न किया; प्रियव्रत—प्रियव्रत; उत्तानपादौ—उत्तानपाद; तिस्र:—तीन; कन्या:—कन्याएँ; च—भी; भारत—हे भरत के पुत्र; आकूति:—आकूति; देवहूति:—देवहूति; च—तथा; प्रसूति:—प्रसूति; इति—इस प्रकार; सत्तम—हे सर्वश्रेष्ठ ।.
 
अनुवाद
 
 हे भरतपुत्र, समय आने पर उसने (मनु ने) शतरूपा से पाँच सन्तानें उत्पन्न कीं—दो पुत्र प्रियव्रत तथा उत्तानपाद एवं तीन कन्याएँ आकूति, देवहूति तथा प्रसूति।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥