श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक
धिया निगृह्यमाणोऽपि भ्रुवोर्मध्यात्प्रजापते: ।
सद्योऽजायत तन्मन्यु: कुमारो नीललोहित: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
धिया—बुद्धि से; निगृह्यमाण:—नियंत्रित हुए; अपि—के बावजूद; भ्रुवो:—भौहों के; मध्यात्—बीच से; प्रजापते:—ब्रह्मा के; सद्य:—तुरन्त; अजायत—उत्पन्न हुआ; तत्—उसका; मन्यु:—क्रोध; कुमार:—बालक; नील-लोहित:—नीले तथा लाल का मिश्रण ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि उन्होंने अपने क्रोध को दबाए रखने का प्रयास किया, किन्तु वह उनकी भौंहों के मध्य से प्रकट हो ही गया जिससे तुरन्त ही नीललोहित रंग का बालक उत्पन्न हुआ।
 
तात्पर्य
 क्रोध चाहे जानकर प्रकट किया जाय या अनजाने में, उसकी मुखाकृति वही रहती है। यद्यपि ब्रह्मा ने अपना क्रोध नियंत्रित करना चाहा, किन्तु वे ऐसा नहीं कर पाये, तबभी, जबकि वे सर्वोच्च पुरुष हैं। ऐसा क्रोध ब्रह्मा की भौंहों के बीच से रुद्र के रूप में अपने सही रंग में प्रकट हो आया जो नीले (तमो) तथा लाल (रजो) रंग का मिश्रण था, क्योंकि क्रोध रजो तथा तमो गुणों की उपज है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥