श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
निशम्य वाचं वदतो मुने: पुण्यतमां नृप ।
भूय: पप्रच्छ कौरव्यो वासुदेवकथाद‍ृत: ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; निशम्य—सुन कर; वाचम्—बातें; वदत:—बोलते हुए; मुने:—मैत्रेय मुनि का; पुण्य-तमाम्—अत्यन्त पुण्यमय; नृप—हे राजा; भूय:—तब फिर; पप्रच्छ—पूछा; कौरव्य:—कुरुओं में सर्वश्रेष्ठ (विदुर); वासुदेव-कथा—भगवान् वासुदेव विषयक कथाएँ; आदृत:—जो इस तरह सादर पूजता है ।.
 
अनुवाद
 
 श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन्, मैत्रेय मुनि से इन समस्त पुण्यतम कथाओं को सुनने के बाद विदुर ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की कथाओं के विषय में और अधिक पूछताछ की, क्योंकि इनका आदरपूर्वक सुनना उन्हें पसन्द था।
 
तात्पर्य
 आदृत: शब्द महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह संकेत देता है कि विदुर में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के दिव्य सन्देश सुनने के प्रति स्वाभाविक झुकाव था। वे इन कथाओं को लगातार सुनते रहकर कभी भी पूरी तरह तुष्ट नहीं होते थे। वे अधिकाधिक सुनना चाह रहे थे जिससे वे दिव्य सन्देश द्वारा अधिकाधिक कृतार्थ हो सकें।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥