श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक
स त्वमस्यामपत्यानि सद‍ृशान्यात्मनो गुणै: ।
उत्पाद्य शास धर्मेण गां यज्ञै: पुरुषं यज ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
परम्—सबसे बड़ी; शुश्रूषणम्—भक्ति; मह्यम्—मेरे प्रति; स्यात्—होनी चाहिए; प्रजा—भौतिक जगत में उत्पन्न जीव; रक्षया— बिगडऩे से बचाकर; नृप—हे राजा; भगवान्—भगवान्; ते—तुम्हारे साथ; प्रजा-भर्तु:—जीवों के रक्षक के साथ; हृषीकेश:— इन्द्रियों के स्वामी; अनुतुष्यति—तुष्ट होता है ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, यदि तुम भौतिक जगत में जीवों को उचित सुरक्षा प्रदान कर सको तो मेरे प्रति वह सर्वोत्तम सेवा होगी। जब परमेश्वर तुम्हें बद्धजीवों के उत्तम रक्षक के रूप में देखेंगे तो इन्द्रियों के स्वामी निश्चय ही तुम पर अतीव प्रसन्न होंगे।
 
तात्पर्य
 सम्पूर्ण प्रशासनिक प्रणाली भगवद्धाम् वापस जाने के लिए व्यवस्थित की जाती है। ब्रह्माजी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रतिनिधि हैं और मनु ब्रह्मा के प्रतिनिधि हैं। इसी तरह ब्रह्माण्ड के विभिन्न लोकों के अन्य सारे राजा मनु के प्रतिनिधि हैं। सम्पूर्ण मानव समाज के लिए मनुसंहिता विधि ग्रन्थ है, जो सारे कार्यों को भगवान् की दिव्य सेवा की ओर निर्देशित करता है। इसलिए प्रत्येक राजा को यह जानना चाहिए कि प्रशासन में उसका उत्तरदायित्व नागरिकों से केवल कर वसूल करना ही नहीं है, अपितु स्वयं यह देखना है कि उसके अधीन सारे नागरिकों को विष्णु पूजा का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। हर व्यक्ति को विष्णु पूजा की शिक्षा दी जानी चाहिए और इन्द्रियों के स्वामी हृषीकेश की भक्ति में लगाया जाना चाहिए। बद्धजीव अपनी भौतिक इच्छाओं को तुष्ट करने के लिए नहीं हैं अपितु भगवान् हृषीकेश की इन्द्रियों को तुष्ट करने के लिए हैं। सम्पूर्ण प्रशासनिक प्रणाली का यही उद्देश्य है। जो ब्रह्मा के कथन द्वारा उद्धाटित इस रहस्य को जानता है, वही पूर्ण प्रशासनिक प्रमुख है। जो इसे नहीं जानता वह दिखावटी प्रशासक है। नागरिकों को भगवद्भक्ति में प्रशिक्षित करने से राज्य का प्रमुख अपने उत्तरदायित्व से मुक्त हो सकता है, अन्यथा वह उसे सौंपे हुए दूभर कार्य को करने में विफल होगा और इस तरह वह परम अधिकारी द्वारा दण्डनीय होगा। प्रशासनिक कर्तव्य निबाहने का इसके सिवा कोई अन्य विकल्प नहीं है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥