श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 13

 
श्लोक
येषां न तुष्टो भगवान् यज्ञलिङ्गो जनार्दन: ।
तेषां श्रमो ह्यपार्थाय यदात्मा नाद‍ृत: स्वयम् ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
येषाम्—उनका जिनके साथ; न—कभी नहीं; तुष्ट:—तुष्ट; भगवान्—भगवान्; यज्ञ-लिङ्ग:—यज्ञ का स्वरूप; जनार्दन:— भगवान् कृष्ण या विष्णुतत्त्व; तेषाम्—उनका; श्रम:—श्रम; हि—निश्चय ही; अपार्थाय—बिना लाभ के; यत्—क्योंकि; आत्मा—परमात्मा; न—नहीं; आदृत:—सम्मानित; स्वयम्—स्वयं ।.
 
अनुवाद
 
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् जनार्दन (कृष्ण) ही समस्त यज्ञ फलों को स्वीकार करने वाले हैं। यदि वे तुष्ट नहीं होते तो प्रगति के लिए किया गया मनुष्य का श्रम व्यर्थ है। वे चरम आत्मा हैं, अतएव जो व्यक्ति उन्हें तुष्ट नहीं करता वह निश्चय ही अपने ही हितों की उपेक्षा करता है।
 
तात्पर्य
 ब्रह्मा को ब्रह्माण्ड के मामलों का सर्वोच्च अध्यक्ष नियुक्त किया गया है और वे भौतिक जगत के मामलों के संचालन हेतु मनु तथा अन्यों को नियुक्त करते हैं, किन्तु यह सारा प्रदर्शन परमेश्वर की तुष्टि के हेतु है। ब्रह्माजी जानते हैं कि भगवान् को कैसे तुष्ट किया जाता है। इसी तरह ब्रह्मा की कार्य योजना में लगे लोग भी जानते हैं कि भगवान् को किस तरह तुष्ट करना चाहिए। भगवान् भक्तियोग द्वारा तुष्ट किये जाते हैं जिसके अन्तर्गत श्रवण, कीर्तन, इत्यादि नौ विधियाँ आती हैं। यह तो मनुष्य के अपने हित में है कि नियत
भक्ति सम्पन्न की जाय और जो भी इस विधि की उपेक्षा करता है, वह अपने ही हित की उपेक्षा करता है। हर व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को तुष्ट करना चाहता है, किन्तु इन्द्रियों से भी ऊपर मन है और मन के ऊपर बुद्धि तथा बुद्धि के ऊपर व्यष्टि आत्मा तथा व्यष्टि आत्मा के ऊपर परमात्मा है। परमात्मा के भी ऊपर पुरुषोत्तम भगवान् या विष्णु तत्त्व है। आदि भगवान् तथा सभी कारणों के कारण श्रीकृष्ण हैं। सिद्धिसेवा की सम्पूर्ण विधि उन भगवान् कृष्ण की दिव्य इन्द्रियों की तुष्टि हेतु सेवा करना है, जो जनार्दन कहलाते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥