श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
मनुरुवाच
आदेशेऽहं भगवतो वर्तेयामीवसूदन ।
स्थानं त्विहानुजानीहि प्रजानां मम च प्रभो ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
मनु: उवाच—श्री मनु ने कहा; आदेशे—आदेश के अन्तर्गत; अहम्—मैं; भगवत:—शक्तिशाली आपका; वर्तेय—रुकूँगा; अमीव-सूदन—हे समस्त पापों के संहारक; स्थानम्—स्थान; तु—लेकिन; इह—इस जगत में; अनुजानीहि—कृपया मुझे बतलाइये; प्रजानाम्—मुझसे उत्पन्न जीवधारियों का; मम—मेरा; च—भी; प्रभो—हे प्रभु ।.
 
अनुवाद
 
 श्री मनु ने कहा : हे सर्वशक्तिमान प्रभु, हे समस्त पापों के संहर्ता, मैं आपके आदेशों का पालन करूँगा। कृपया मुझे मेरा तथा मुझसे उत्पन्न जीवों के बसने के लिए स्थान बतलाएँ।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥