श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
यदोक: सर्वभूतानां मही मग्ना महाम्भसि ।
अस्या उद्धरणे यत्नो देव देव्या विधीयताम् ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—क्योंकि; ओक:—वासस्थान; सर्व—सभी के लिए; भूतानाम्—जीवों के लिए; मही—पृथ्वी; मग्ना—डूबी हुई; महा- अम्भसि—विशाल जल में; अस्या:—इसके; उद्धरणे—उठाने में; यत्न:—प्रयास; देव—हे देवताओं के स्वामी; देव्या:—इस पृथ्वी का; विधीयताम्—कराएँ ।.
 
अनुवाद
 
 हे देवताओं के स्वामी, विशाल जल में डूबी हुई पृथ्वी को ऊपर उठाने का प्रयास करें, क्योंकि यह सारे जीवों का वासस्थान है। यह आपके प्रयास तथा भगवान् की कृपा से ही सम्भव है।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर उल्लिखित विशाल जलागार गर्भोदक सागर है, जो ब्रह्माण्ड के आधे भाग में भरा हुआ है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥