श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 16

 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
परमेष्ठी त्वपां मध्ये तथा सन्नामवेक्ष्य गाम् ।
कथमेनां समुन्नेष्य इति दध्यौ धिया चिरम् ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—श्री मैत्रेय मुनि ने कहा; परमेष्ठी—ब्रह्मा; तु—भी; अपाम्—जल के; मध्ये—भीतर; तथा—इस प्रकार; सन्नाम्—स्थित; अवेक्ष्य—देखकर; गाम्—पृथ्वी को; कथम्—कैसे; एनाम्—यह; समुन्नेष्ये—मैं उठा लूँगा; इति—इस प्रकार; दध्यौ—ध्यान दिया; धिया—बुद्धि से; चिरम्—दीर्घ काल तक ।.
 
अनुवाद
 
 श्री मैत्रेय ने कहा : इस प्रकार पृथ्वी को जल में डूबी हुई देखकर ब्रह्मा दीर्घकाल तक सोचते रहे कि इसे किस प्रकार उठाया जा सकता है।
 
तात्पर्य
 जीव गोस्वामी के अनुसार यहाँ पर जिन कथाओं का उद्धाटन किया गया है वे विभिन्न कल्पों की हैं। वर्तमान
कथाएँ श्वेत वराह कल्प की हैं और चाक्षुष कल्प की कथाओं को भी इसी अध्याय में बतलाया जायेगा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥