श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक
इत्यभिध्यायतो नासाविवरात्सहसानघ ।
वराहतोको निरगादङ्गुष्ठपरिमाणक: ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस प्रकार; अभिध्यायत:—सोचते हुए; नासा-विवरात्—नथुनों से; सहसा—एकाएक; अनघ—हे निष्पाप; वराह तोक:—वराह का लघुरूप (सूअर); निरगात्—बाहर आया; अङ्गुष्ठ—अँगूठे का ऊपरी हिस्सा; परिमाणक:—माप वाला ।.
 
अनुवाद
 
 हे निष्पाप विदुर, जब ब्रह्माजी विचारमग्न थे तो उनके नथुने से सहसा एक सूअर (वराह) का लघुरूप बाहर निकल आया। इस प्राणी की माप अँगूठे के ऊपरी हिस्से से अधिक नहीं थी।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥