श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
तस्याभिपश्यत: खस्थ: क्षणेन किल भारत ।
गजमात्र: प्रववृधे तदद्भुतमभून्महत् ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—उसका; अभिपश्यत:—इस प्रकार देखते हुए; ख-स्थ:—आकाश में स्थित; क्षणेन—सहसा; किल—निश्चय ही; भारत—हे भरतवंशी; गज-मात्र:—हाथी के समान; प्रववृधे—भलीभाँति विस्तार किया; तत्—वह; अद्भुतम्—असामान्य; अभूत्—बदल गया; महत्—विराट शरीर में ।.
 
अनुवाद
 
 हे भरतवंशी, तब ब्रह्मा के देखते ही देखते वह वराह विशाल काय हाथी जैसा अद्भुत विराट स्वरूप धारण करके आकाश में स्थित हो गया।
 
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥