श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक
द‍ृष्टोऽङ्गुष्ठशिरोमात्र: क्षणाद्‍गण्डशिलासम: ।
अपि स्विद्भगवानेष यज्ञो मे खेदयन्मन: ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
दृष्ट:—अभी-अभी देखा हुआ; अङ्गुष्ठ—अँगूठे का; शिर:—सिरा; मात्र:—केवल; क्षणात्—तुरन्त; गण्ड-शिला—विशाल पत्थर; सम:—सदृश; अपि स्वित्—क्या; भगवान्—भगवान्; एष:—यह; यज्ञ:—विष्णु; मे—मेरा; खेदयन्—खिन्न; मन:— मन ।.
 
अनुवाद
 
 प्रारम्भ में यह सूकर अँगूठे के सिरे से बड़ा न था, किन्तु क्षण भर में वह शिला के समान विशाल बन गया। मेरा मन विक्षुब्ध है। क्या वह पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु हैं?
 
तात्पर्य
 चूँकि ब्रह्माजी इस ब्रह्माण्ड के सर्वोपरि पुरुष हैं और इसके पूर्व उन्होंने ऐसा रूप नहीं देखा था, अतएव वे अनुमान नहीं लगा पाये कि शूकर का प्राकट्य विष्णु का अवतार था। भगवान् के अवतार के असामान्य लक्षण ब्रह्मा तक के मन को मोहित कर सकते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥