श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक
इति मीमांसतस्तस्य ब्रह्मण: सह सूनुभि: ।
भगवान् यज्ञपुरुषो जगर्जागेन्द्रसन्निभ: ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस प्रकार; मीमांसत:—विचार-विमर्श करते; तस्य—उस; ब्रह्मण:—ब्रह्मा के; सह—साथ-साथ; सूनुभि:—उनके पुत्रगण; भगवान्—परमेश्वर; यज्ञ—भगवान् विष्णु ने; पुरुष:—सर्वश्रेष्ठ पुरुष; जगर्ज—गर्जना की; अग-इन्द्र—विशाल पर्वत; सन्निभ:—सदृश ।.
 
अनुवाद
 
 जब ब्रह्माजी अपने पुत्रों के साथ विचार-विमर्श कर रहे थे तो पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु ने विशाल पर्वत के समान गम्भीर गर्जना की।
 
तात्पर्य
 ऐसा प्रतीत होता है कि विशाल पर्वतों में भी उनकी गर्जना शक्ति होती है, क्योंकि वे भी जीव हैं। ध्वनि गर्जन की गहनता भौतिक शरीर के आकार के अनुपात में होती है। अभी ब्रह्माजी भगवान् के शूकर अवतार के प्रकट होने के विषय में अनुमान लगा ही रहे थे कि भगवान् ने अपनी गम्भीर वाणी द्वारा गर्जना करके ब्रह्मा के अनुमान की पुष्टि कर दी।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥