श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
निशम्य ते घर्घरितं स्वखेद-
क्षयिष्णु मायामयसूकरस्य ।
जनस्तप:सत्यनिवासिनस्ते
त्रिभि: पवित्रैर्मुनयोऽगृणन् स्म ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
निशम्य—सुनकर; ते—वे; घर्घरितम्—कोलाहलपूर्ण ध्वनि, घुरघुराहट; स्व-खेद—निजी शोक; क्षयिष्णु—विनष्ट करने वाला; माया-मय—सर्व कृपालु; सूकरस्य—सूकर का; जन:—जनलोक; तप:—तपोलोक; सत्य—सत्यलोक के; निवासिन:— निवासी; ते—वे सभी; त्रिभि:—तीन वेदों से; पवित्रै:—शुभ मंत्रों से; मुनय:—महान् चिन्तकों तथा ऋषियों ने; अगृणन् स्म— उच्चारण किया ।.
 
अनुवाद
 
 जब जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक के निवासी महर्षियों तथा चिन्तकों ने भगवान् सूकर की कोलाहलपूर्ण वाणी सुनी, जो सर्वकृपालु भगवान् की सर्वकल्याणमय ध्वनि थी तो उन्होंने तीनों वेदों से शुभ मंत्रों का उच्चारण किया।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में मायामय शब्द अत्यन्त सार्थक है। माया का अर्थ है “कृपा” “विशेष ज्ञान” तथा “मोह”। इसलिए भगवान् शूकर सर्वस्व हैं—वे दयालु हैं, वे समस्त ज्ञान हैं और वे मोह भी हैं। वराह अवतार के रूप में उन्होंने जो ध्वनि की उसका उत्तर जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक में रहनेवाले मुनियों ने वैदिक मंत्रों से दिया। उन लोकों में सर्वोच्च बुद्धिमान तथा पवित्र जीव निवास करते हैं अत: जब उन्होंने वराह की असाधारण ध्वनि सुनी तो वे यह समझ गये कि यह विशेष ध्वनि भगवान् के अतिरिक्त अन्य किसी की नहीं हो सकती। इसलिए उन्होंने वैदिक मंत्रों से भगवान् की प्रार्थना करते हुए उसका उत्तर दिया। यद्यपि पृथ्वी कीचड़ में धँसी हुई थी, किन्तु भगवान् की ध्वनि सुनकर उच्चतर लोकों के निवासी परम हर्षित हुए, क्योंकि वे जान गये कि पृथ्वी का उद्धार करने के लिए भगवान् वहाँ थे। अतएव ब्रह्मा तथा सारे साधुगण यथा भृगु, ब्रह्मा के अन्य पुत्र तथा विद्वान ब्राह्मण जीवन्त हो उठे और उन्होंने मिलकर वैदिक मंत्रों की दिव्य ध्वनि से भगवान् की प्रशंसा करने में उनका साथ दिया। सबसे महत्त्वपूर्ण मंत्र वृहन्नारदीय पुराण का मंत्र है—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे। हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥