श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक
उत्क्षिप्तवाल: खचर: कठोर:
सटा विधुन्वन् खररोमशत्वक् ।
खुराहताभ्र: सितदंष्ट्र ईक्षा-
ज्योतिर्बभासे भगवान्महीध्र: ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
उत्क्षिप्त-वाल:—पूँछ फटकारते; ख-चर:—आकाश में; कठोर:—अति कठोर; सटा:—कंधे तक लटकते बाल; विधुन्वन्— हिलाता; खर—तेज; रोमश-त्वक्—रोओं से भरी त्वचा; खुर-आहत—खुरों से टकराया; अभ्र:—बादल; सित-दंष्ट्र:—सफेद दाढ़ें; ईक्षा—चितवन; ज्योति:—चमकीली; बभासे—तेज निकालने लगा; भगवान्—भगवान्; मही-ध्र:—जगत को धारण करने वाला ।.
 
अनुवाद
 
 पृथ्वी का उद्धार करने के लिए जल में प्रवेश करने के पूर्व भगवान् वराह अपनी पूँछ फटकारते तथा अपने कड़े बालों को हिलाते हुए आकाश में उड़े। उनकी चितवन चमकीली थी। और उन्होंने अपने खुरों तथा चमचमाती सफेद दाढ़ों से आकाश में बादलों को बिखरा दिया।
 
तात्पर्य
 जब भक्तों द्वारा भगवान् की स्तुतियाँ की जाती हैं, तो उनके दिव्य कार्यों का ही वर्णन होता है। भगवान् वराह के कुछ दिव्य गुण यहाँ दिये गये हैं। चूँकि तीनों उच्च लोकों के निवासियों ने भगवान् की स्तुतियाँ कीं, अत: यह समझा जाता है कि उनका शरीर सर्वोच्च लोक ब्रह्मलोक या सत्यलोक से लेकर पूरे आकाश में फैल गया था। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है कि उनकी आँखें सूर्य तथा चन्द्रमा हैं, अतएव आकाश पर उनकी चितवन सूर्य या चन्द्रमा जितनी चमकीली थी। यहाँ पर भगवान् को महीध्र: कहा गया है, जिसका अर्थ है “विशाल पर्व” अथवा “पृथ्वी को धारण करने वाला।” दूसरे शब्दों में, भगवान् का शरीर हिमालय पर्वत जैसा विशाल तथा कठोर था, अन्यथा वे सम्पूर्ण पृथ्वी को अपनी श्वेत दाढ़ों के सहारे किस तरह धारण करते? भगवान् के महान् भक्त कविवर जयदेव ने इस घटना को अवतारों की अपनी स्तुति में इस प्रकार गाया है—

वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना शशिनि कलंककलेव निमग्ना केशव धृत शूकर रूप जय जगदीश हरे ॥

“भगवान् केशव (कृष्ण) की जय हो जो शूकर के रूप में प्रकट हुए। पृथ्वी उनकी दाढ़ों के बीच में पकड़ी हुई थी जो चन्द्रमा पर कलंक के निशान जैसी प्रतीत हो रही थी।”

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥