श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक
खुरै: क्षुरप्रैर्दरयंस्तदाप
उत्पारपारं त्रिपरू रसायाम् ।
ददर्श गां तत्र सुषुप्सुरग्रे
यां जीवधानीं स्वयमभ्यधत्त ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
खुरै:—खुरों से; क्षुरप्रै:—तेज हथियार के समान; दरयन्—घुस कर; तत्—वह; आप:—जल; उत्पार-पारम्—असीम् की सीमा पा ली; त्रि-परु:—सभी यज्ञों का स्वामी; रसायाम्—जल के भीतर; ददर्श—पाया; गाम्—पृथ्वी को; तत्र—वहाँ; सुषुप्सु:— लेटे हुए; अग्रे—प्रारम्भ में; याम्—जिसको; जीव-धानीम्—सभी जीवों की विश्राम की स्थली; स्वयम्—स्वयं; अभ्यधत्त— ऊपर उठा लिया ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् वराह तीरों जैसे नुकीले अपने खुरों से जल में घुस गये और उन्होंने अथाह समुद्र की सीमा पा ली। उन्होंने समस्त जीवों की विश्रामस्थली पृथ्वी को उसी तरह पड़ी देखा जिस तरह वह सृष्टि के प्रारम्भ में थी और उन्होंने उसे स्वयं ऊपर उठा लिया।
 
तात्पर्य
 कभी-कभी रसायाम् का अर्थ रसातल अर्थात् निम्नतम लोक निकाला जाता है, किन्तु श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार इस प्रसंग में यह लागू नहीं होता। पृथ्वी अन्य लोकों अर्थात् तल, अतल, तलातल, वितल, रसातल, पाताल इत्यादि की अपेक्षा सात गुनी श्रेष्ठ है। अत:पृथ्वी रसातल लोक में स्थित नहीं हो सकती। विष्णु धर्म में वर्णन हुआ है कि—

पातालमूलेश्वरभोगसंहतौ विन्यस्य पादौ पृथिवीं च बिभ्रत:।

यस्योपमानो न बभूव सोऽच्युतो ममास्तु माङ्गल्यविवृद्धये हरि: ॥

अतएव भगवान् ने पृथ्वी को गर्भोदक सागर की पेंदी में पाया जहाँ ब्रह्मा के दिन की समाप्ति पर प्रलय के समय सारे लोक विश्राम करते हैं।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥