श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक
ऋषय ऊचु:
जितं जितं तेऽजित यज्ञभावन
त्रयीं तनुं स्वां परिधुन्वते नम: ।
यद्रोमगर्ेषु निलिल्युरद्धय-
स्तस्मै नम: कारणसूकराय ते ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
ऋषय: ऊचु:—यशस्वी ऋषि बोल पड़े; जितम्—जय हो; जितम्—जय हो; ते—तुम्हारी; अजित—हे न जीते जा सकने वाले; यज्ञ-भावन—यज्ञ सम्पन्न करने पर जाना जाने वाले; त्रयीम्—साक्षात् वेद; तनुम्—ऐसा शरीर; स्वाम्—अपना; परिधुन्वते— हिलाते हुए; नम:—नमस्कार; यत्—जिसके; रोम—रोएँ; गर्तेषु—छेदों में; निलिल्यु:—डूबे हुए; अद्धय:—सागर; तस्मै— उसको; नम:—नमस्कार करते हुए; कारण-सूकराय—सकारण शूकर विग्रह धारण करने वाले; ते—तुमको ।.
 
अनुवाद
 
 सारे ऋषि अति आदर के साथ बोल पड़े“ हे समस्त यज्ञों के अजेय भोक्ता, आपकी जय हो, जय हो, आप साक्षात् वेदों के रूप में विचरण कर रहे हैं और आपके शरीर के रोमकूपों में सारे सागर समाये हुए हैं। आपने किन्हीं कारणों से (पृथ्वी का उद्धार करने के लिए) अब सूकर का रूप धारण किया है।
 
तात्पर्य
 भगवान् इच्छानुसार कोई भी रूप धारण कर सकते हैं और सारी परिस्थितियों में वे समस्त कारणों के कारण हैं। चूँकि उनका रूप दिव्य होता है, अत: वे सदैव पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं जैसे कि कारणार्णव में वे महाविष्णु के रूप में रहते हैं। उनके शरीर के रोमकूपों से असंख्य ब्रह्माण्ड उत्पन्न होते हैं और इस तरह उनका दिव्य शरीर साक्षात् वेद हैं। वे समस्त यज्ञों के भोक्ता हैं और अजेय पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। उनसे मात्र इसलिए भगवान् के अतिरिक्त अन्य किसी रूप का भ्रम नहीं होना चाहिए कि पृथ्वी का उद्धार करने के लिए उन्होंने शूकर रूप धारण किया है। ऋषियों तथा ब्रह्मा जैसे महापुरुष एवं उच्च लोकों के अन्य वासियों की यही स्पष्ट धारणा है।
 
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