श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक
दीक्षानुजन्मोपसद: शिरोधरं
त्वं प्रायणीयोदयनीयदंष्ट्र: ।
जिह्वा प्रवर्ग्यस्तव शीर्षकं क्रतो:
सत्यावसथ्यं चितयोऽसवो हि ते ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
दीक्षा—दीक्षा; अनुजन्म—आध्यात्मिक जन्म या बारम्बार अवतार; उपसद:—तीन प्रकार की इच्छाएँ (सम्बन्ध, कर्म तथा चरम लक्ष्य); शिर:-धरम्—गर्दन; त्वम्—तुम; प्रायणीय—दीक्षा के परिणाम के बाद; उदयनीय—इच्छाओं का अन्तिम संस्कार; दंष्ट्र:—दाढ़ें; जिह्वा—जीभ; प्रवर्ग्य:—पहले के कार्य; तव—तुम्हारा; शीर्षकम्—सिर; क्रतो:—यज्ञ का; सत्य—यज्ञ के बिना अग्नि; आवसथ्यम्—पूजा की अग्नि; चितय:—समस्त इच्छाओं का समूह; असव:—प्राणवायु; हि—निश्चय ही; ते—तुम्हारा ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, इसके साथ ही साथ सभी प्रकार की दीक्षा के लिए आपके बारम्बार प्राकट्य की आकांक्षा भी है। आपकी गर्दन तीनों इच्छाओं का स्थान है और आपकी दाढ़ें दीक्षा-फल तथा सभी इच्छाओं का अन्त हैं, आप की जिव्हा दीक्षा के पूर्व-कार्य हैं, आपका सिर यज्ञ रहित अग्नि तथा पूजा की अग्नि है तथा आप की जीवनी-शक्ति समस्त इच्छाओं का समुच्चय है।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥