श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक
सोमस्तु रेत: सवनान्यवस्थिति:
संस्थाविभेदास्तव देव धातव: ।
सत्राणि सर्वाणि शरीरसन्धि-
स्त्वं सर्वयज्ञक्रतुरिष्टिबन्धन: ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
सोम: तु रेत:—आपका वीर्य सोमयज्ञ है; सवनानि—प्रात:काल के अनुष्ठान; अवस्थिति:—शारीरिक वृद्धि की विभिन्न अवस्थाएँ; संस्था-विभेदा:—यज्ञ के सात प्रकार; तव—तुम्हारा; देव—हे प्रभु; धातव:—शरीर के अवयव यथा त्वचा एवं मांस; सत्राणि—बारह दिनों तक चलने वाले यज्ञ; सर्वाणि—सारे; शरीर—शारीरिक; सन्धि:—जोड़; त्वम्—आप; सर्व—समस्त; यज्ञ—असोम यज्ञ; क्रतु:—सोम यज्ञ; इष्टि—चरम इच्छा; बन्धन:—आसक्ति ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, आपका वीर्य सोम नामक यज्ञ है। आपकी वृद्धि प्रात:काल सम्पन्न किये जाने वाले कर्मकाण्डीय अनुष्ठान हैं। आपकी त्वचा तथा स्पर्श अनुभूति अग्निष्टोम यज्ञ के सात तत्त्व हैं। आपके शरीर के जोड़ बारह दिनों तक किये जाने वाले विविध यज्ञों के प्रतीक हैं। अतएव आप सोम तथा असोम नामक सभी यज्ञों के लक्ष्य हैं और आप एकमात्र यज्ञों से बँधे हुए हैं।
 
तात्पर्य
 वैदिक कर्मकाण्ड के अनुयायी सात प्रकार के सामान्य यज्ञ करते हैं, जिन्हें अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र तथा आप्तोर्याम कहते हैं। जो भी व्यक्ति ऐसे यज्ञों को नियमित रूप से सम्पन्न
करता है, वह भगवान् के पास स्थित माना जाता है। किन्तु जो कोई भक्ति योग सम्पन्न करके भगवान् के सम्पर्क में रहता है उसके लिए यह समझा जाता है कि उसने विभिन्न प्रकार के सभी यज्ञ सम्पन्न कर लिए हैं।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥