श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक
क: श्रद्दधीतान्यतमस्तव प्रभो
रसां गताया भुव उद्विबर्हणम् ।
न विस्मयोऽसौ त्वयि विश्वविस्मये
यो माययेदं ससृजेऽतिविस्मयम् ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
क:—और कौन; श्रद्दधीत—प्रयास कर सकता है; अन्यतम:—आपके अतिरिक्त अन्य कोई; तव—तुम्हारा; प्रभो—हे प्रभु; रसाम्—जल में; गताया:—पड़ी हुई; भुव:—पृथ्वी को; उद्विबर्हणम्—उद्धार; न—कभी नहीं; विस्मय:—आश्चर्यमय; असौ— ऐसा कार्य; त्वयि—तुमको; विश्व—विश्व के; विस्मये—आश्चर्यों से पूर्ण; य:—जो; मायया—शक्तियों द्वारा; इदम्—यह; ससृजे—उत्पन्न किया; अतिविस्मयम्—सभी आश्चर्यों से बढक़र ।.
 
अनुवाद
 
 हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, आपके अतिरिक्त ऐसा कौन है, जो जल के भीतर से पृथ्वी का उद्धार कर सकता? किन्तु यह आपके लिए बहुत आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि ब्रह्माण्ड के सृजन में आपने अति अद्भुत कार्य किया है। अपनी शक्ति से आपने इस अद्भुत विराट जगत की सृष्टि की है।
 
तात्पर्य
 जब कोई विज्ञानी मनुष्य अज्ञानी जन समूह के लिए किसी प्रभावशाली वस्तु की खोज करता है, तो सामान्य लोग बिना पूछताछ के ऐसी खोज को आश्चर्यजनक मान लेते हैं। किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति ऐसी खोजों से तनिक भी आश्चर्यचकित नहीं होता। वह उस व्यक्ति को सारा श्रेय प्रदान करता है, जिसने विज्ञानी के अद्भुत मस्तिष्क को बनाया। एक सामान्य व्यक्ति भी भौतिक प्रकृति के अद्भुत कार्य से विस्मित होता है और वह सारा श्रेय विराट जगत को प्रदान करता है। किन्तु एक विद्वान कृष्णभावनाभावित व्यक्ति यह भली-भाँति जानता रहता है कि विराट जगत के पीछे कृष्ण का मस्तिष्क कार्य करता है, जिसकी पुष्टि भगवद्गीता (९.१०) में हुई है—मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम्। चूँकि कृष्ण अद्भुत विराट जगत का संचालन कर सकते हैं, अतएव उनके लिए वराह का विराट रूप धारण करना और फिर पृथ्वी को जल के कीचड़ से निकालना तनिक भी आश्चर्यजनक नहीं है। इसीलिए भक्त अद्भुत शूकर को देखकर चकित नहीं होता, क्योंकि वह जानता रहता है कि भगवान् में अपनी शक्तियों के द्वारा कहीं अधिक आश्चर्यजनक कार्य जो बड़े से बड़े विद्वान विज्ञानी के मस्तिष्क के लिए अचिन्त्य हैं, करने की क्षमता है।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥