श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक
विधुन्वता वेदमयं निजं वपु-
र्जनस्तप:सत्यनिवासिनो वयम् ।
सटाशिखोद्धूतशिवाम्बुबिन्दुभि-
र्विमृज्यमाना भृशमीश पाविता: ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
विधुन्वता—हिलाते हुए; वेद-मयम्—साक्षात् वेद; निजम्—अपना; वपु:—शरीर; जन:—जनलोक; तप:—तपोलोक; सत्य— सत्यलोक; निवासिन:—निवासी; वयम्—हम; सटा—कन्धे तक लटकते बाल; शिख-उद्धूत—चोटी (शिखा) के द्वारा धारण किया हुआ; शिव—शुभ; अम्बु—जल; बिन्दुभि:—कणों के द्वारा; विमृज्यमाना:—छिडक़े जाते हुए हम; भृशम्—अत्यधिक; ईश—हे परमेश्वर; पाविता:—पवित्र किये गये ।.
 
अनुवाद
 
 हे परमेश्वर, निस्सन्देह, हम जन, तप तथा सत्य लोकों जैसे अतीव पवित्र लोकों के निवासी हैं फिर भी हम आपके शरीर के हिलने से आपके कंधों तक लटकते बालों के द्वारा छिडक़े गए जल की बूँदों से शुद्ध बन गये हैं।
 
तात्पर्य
 सामान्यतया शूकर का शरीर अशुद्ध माना जाता है, किन्तु हमें यह नहीं मानना चाहिए कि भगवान् द्वारा धारण किया हुआ शूकर अवतार भी अशुद्ध है। भगवान् का वह रूप साक्षात् वेद हैं और दिव्य है। जन, तप तथा सत्य लोकों के निवासी भौतिक विश्व के सर्वाधिक पवित्र व्यक्ति हैं, किन्तु क्योंकि ये लोक भी भौतिक जगत में स्थित हैं, अतएव उनमें भी अनेकानेक भौतिक अशुद्धियाँ हैं। इसलिए जब भगवान् के कन्धों तक लटके हुए बालों के अग्रभागों से जल की बूँदें इन उच्चलोकों के निवासियों के शरीरों पर छिडकी गईं तो वे अपने को शुद्ध हुआ अनुभव कर रहे थे। गंगा का जल इसलिए शुद्ध है क्योंकि यह भगवान् के पाँव के अँगूठे से निकलता है और अँगूठे से निकलने वाले जल तथा भगवान् वराह के कन्धों तक लटकते बालों की छोरों से टपकने वाले जल में कोई अन्तर नहीं हैं। दोनों ही परम और दिव्य हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥