श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
इत्युपस्थीयमानोऽसौ मुनिभिर्ब्रह्मवादिभि: ।
सलिले स्वखुराक्रान्त उपाधत्तावितावनिम् ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—मैत्रेय मुनि ने कहा; इति—इस प्रकार; उपस्थीयमान:—प्रशंसित होकर; असौ—भगवान् वराह; मुनिभि:— मुनियों द्वारा; ब्रह्म-वादिभि:—अध्यात्मवादियों द्वारा; सलिले—जल में; स्व-खुर-आक्रान्ते—अपने ही खुरों से स्पर्श हुआ; उपाधत्त—रखा; अविता—पालनकर्ता; अवनिम्—पृथ्वी को ।.
 
अनुवाद
 
 मैत्रेय मुनि ने कहा : इस तरह समस्त महर्षियों तथा दिव्यात्माओं के द्वारा पूजित होकर भगवान् ने अपने खुरों से पृथ्वी का स्पर्श किया और उसे जल पर रख दिया।
 
तात्पर्य
 भगवान् ने अपनी अचिन्त्य शक्ति से पृथ्वी को जल के ऊपर रखा था। भगवान् सर्वशक्तिमान हैं, अतएव वे विशाल लोकों को चाहें तो जल पर या वायु में स्थिर कर सकते हैं। मनुष्य का लघु मस्तिष्क इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता कि भगवान् की ये शक्तियाँ किस तरह कार्य करती हैं। मनुष्य उन नियमों की अस्पष्ट सी व्याख्या कर सकता है जिनसे ऐसी घटनाएँ सम्भव होती हैं, किन्तु वास्तव में लघु मानव मस्तिष्क भगवान् के कार्यों के विषय में कल्पना कर सकने में अशक्त है, इसीलिए वे अचिन्त्य कहलाते हैं। किन्तु तो भी कूपमंडूक दार्शनिक कुछ काल्पनिक व्याख्या करने का प्रयास करते हैं।
 
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