श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 48

 
श्लोक
य एवमेतां हरिमेधसो हरे: ।
कथां सुभद्रां कथनीयमायिन: ।
श‍ृण्वीत भक्त्या श्रवयेत वोशतीं
जनार्दनोऽस्याशु हृदि प्रसीदति ॥ ४८ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; एवम्—इस प्रकार; एताम्—यह; हरि-मेधस:—भक्त के भौतिक शरीर को विनष्ट करनेवाला; हरे:—भगवान् की; कथाम्—कथा; सु-भद्राम्—मंगलकारी; कथनीय—कहने योग्य; मायिन:—उनकी अन्तरंगा शक्ति द्वारा कृपालु का; शृण्वीत—सुनता है; भक्त्या—भक्तिपूर्वक; श्रवयेत—अन्यों को भी सुनाता है; वा—अथवा; उशतीम्—अत्यन्त सुहावना; जनार्दन:—भगवान्; अस्य—उसका; आशु—तुरन्त; हृदि—हृदय के भीतर; प्रसीदति—प्रसन्न हो जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 यदि कोई व्यक्ति भगवान् वराह की इस शुभ एवं वर्णनीय कथा को भक्तिभाव से सुनता है अथवा सुनाता है, तो हर एक के हृदय के भीतर स्थित भगवान् अत्यधिक प्रसन्न होते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् अपने विविध अवतारों में प्रकट होते हैं, कार्य करते हैं और अपने पीछे वर्णनात्मक इतिहास छोड़ जाते हैं, जो स्वयं भगवान् जितना ही दिव्य है। हममें से हर व्यक्ति कोई न कोई अद्भुत कथा सुनने का इच्छुक रहता है, किन्तु अधिकांश कथाएँ न तो मंगलप्रद होती हैं न सुनने के लायक, क्योंकि वे भौतिक प्रकृति की निम्न गुण वाली हैं। प्रत्येक जीव उत्कृष्ट गुण का अर्थात् आत्मा
है और कोई भी भौतिक वस्तु उसके लिए शुभ नहीं हो सकती। इसलिए बुद्धिमान लोगों को भगवान् की विवरणात्मक दृष्टान्त स्वयं सुनने चाहिए और अन्यों को भी सुनने के लिए बाध्य करना चाहिए, क्योंकि इससे संसार का ताप विनष्ट होगा। भगवान् एकमात्र अपनी अहैतुकी कृपा से इस पृथ्वी पर आते हैं और अपने कृपामय कार्यकलापों को पीछे छोड़ते जाते हैं जिससे कि भक्तगण दिव्य लाभ उठा सकें।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥