श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
यदा स्वभार्यया सार्धं जात: स्वायम्भुवो मनु: ।
प्राञ्जलि: प्रणतश्चेदं वेदगर्भमभाषत ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—मैत्रेय ने कहा; यदा—जब; स्व-भार्यया—अपनी पत्नी के; सार्धम्—साथ में; जात:—प्रकट हुआ; स्वायम्भुव:—स्वायम्भुव मनु; मनु:—मानवजाति का पिता; प्राञ्जलि:—हाथ जोड़े; प्रणत:—नमस्कार करके; च—भी; इदम्—यह; वेद-गर्भम्—वैदिक विद्या के आगार को; अभाषत—सम्बोधित किया ।.
 
अनुवाद
 
 मैत्रेय मुनि ने विदुर से कहा : मानवजाति के पिता मनु अपनी पत्नी समेत अपने प्राकट्य के बाद वेदविद्या के आगार ब्रह्मा को नमस्कार करके तथा हाथ जोड़ कर इस प्रकार बोले।
 
 
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥