श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक
त्वमेक: सर्वभूतानां जन्मकृद् वृत्तिद: पिता ।
तथापि न: प्रजानां ते शुश्रूषा केन वा भवेत् ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
त्वम्—तुम; एक:—एक; सर्व—समस्त; भूतानाम्—जीवों के; जन्म-कृत्—जनक; वृत्ति-द:—जीविका का साधन; पिता— पिता; तथा अपि—तो भी; न:—हम; प्रजानाम्—उत्पन्न हुए सबों का; ते—तुम्हारी; शुश्रूषा—सेवा; केन—कैसे; वा—अथवा; भवेत्—सम्भव हो सकती है ।.
 
अनुवाद
 
 आप सारे जीवों के पिता तथा उनकी जीविका के स्रोत हैं, क्योंकि वे सभी आपसे उत्पन्न हुए हैं। कृपा करके हमें आदेश दें कि हम आपकी सेवा किस तरह कर सकते हैं।
 
तात्पर्य
 पुत्र का कर्तव्य है कि वह अपने पिता को केवल अपनी सारी आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन के रूप में इस्तेमाल न करे, अपितु जब वह बड़ा हो जाय तो वह उसकी सेवा भी करे। यही ब्रह्मा के समय से सृष्टि का नियम चला आ रहा है। पिता का कर्तव्य है कि जब तक पुत्र बड़ा न हो जाय उसका पालनपोषण करे और जब पुत्र बड़ा हो जाय तो पुत्र का कर्तव्य है कि वह पिता की सेवा करे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥