श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 14: संध्या समय दिति का गर्भ-धारण  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
तद्भवान्दह्यमानायां सपत्नीनां समृद्धिभि: ।
प्रजावतीनां भद्रं ते मय्यायुङ्क्तामनुग्रहम् ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—इसलिए; भवान्—आप; दह्यमानायाम्—सताई जा रही; स-पत्नीनाम्—सौतों की; समृद्धिभि:—समृद्धि द्वारा; प्रजा वतीनाम्—सन्तान वालियों की; भद्रम्—समस्त समृद्धि; ते—तुमको; मयि—मुझको; आयुङ्क्ताम्—सभी तरह से, मुझपर करें; अनुग्रहम्—कृपा ।.
 
अनुवाद
 
 अतएव आपको मुझ पर पूर्ण दया दिखाते हुए मेरे प्रति कृपालु होना चाहिए। मुझे पुत्र प्राप्त करने की चाह है और मैं अपनी सौतों का ऐश्वर्य देखकर अत्यधिक व्यथित हूँ। इस कृत्य को करने से आप सुखी हो सकेंगे।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में सन्तानोत्पत्ति के लिए संभोग को धर्मोचित बताया गया है। किन्तु केवल इन्दियतृप्ति के लिए कामोन्मुख होना उचित नहीं है। संभोग के लिए अपने पति से दिति की याचना में ऐसा कुछ नहीं था कि वह कामेच्छा से पीडि़त थी, अपितु वह पुत्र चाहती थी। चूँकि उसके कोई पुत्र न था इसलिए वह स्वयं को अपनी सौतों की अपेक्षा हेय समझ रही थी। अत: कश्यप से अपेक्षा की जाती थी कि वे अपनी प्रामाणिक पत्नी को तुष्ट करें।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥