श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 14: संध्या समय दिति का गर्भ-धारण  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
इति तां वीर मारीच: कृपणां बहुभाषिणीम् ।
प्रत्याहानुनयन् वाचा प्रवृद्धानङ्गकश्मलाम् ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस प्रकार; ताम्—उस; वीर—हे वीर; मारीच:—मरीचि पुत्र (कश्यप); कृपणाम्—निर्धन को; बहु-भाषिणीम्— अत्यधिक बातूनी को; प्रत्याह—उत्तर दिया; अनुनयन्—शान्त करते हुए; वाचा—शब्दों से; प्रवृद्ध—अत्यधिक उत्तेजित; अनङ्ग—कामवासना; कश्मलाम्—दूषित ।.
 
अनुवाद
 
 हे वीर (विदुर), इस तरह कामवासना के कल्मष से ग्रस्त, और इसलिए असहाय एवं बड़बड़ाती हुई दिति को मरीचिपुत्र ने समुचित शब्दों से शान्त किया।
 
तात्पर्य
 जब कोई पुरुष या स्त्री कामवासना से ग्रस्त होता है, तो इसे पापपूर्ण कल्मष कहा जाता है। कश्यप अपने आध्यात्मिक कार्यों में संलग्न थे तो भी उनमें इतनी शक्ति न थी कि वे अपनी पत्नी को मना कर सकते जो इस तरह पीडि़त थी। वे कठोर शब्दों में अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए इनकार कर सकते थे, किन्तु वे विदुर की तरह आध्यात्मिक रूप से बलवान् नहीं थे। विदुर को यहाँ वीर कहकर सम्बोधित किया गया है, क्योंकि भगवद्भक्त की अपेक्षा आत्मसंयम में कोई भी अधिक बलवान नहीं होता। ऐसा प्रतीत होता है कि कश्यप पहले से अपनी पत्नी के साथ सम्भोग-आनन्द के लिए उन्मुख थे और चूँकि वे दृढ़ व्यक्ति नहीं थे, अतएव उन्होंने केवल सान्त्वनाप्रद शब्दों से उसे विरत करने का प्रयास किया।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥