श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 14: संध्या समय दिति का गर्भ-धारण  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
एष तेऽहं विधास्यामि प्रियं भीरु यदिच्छसि ।
तस्या: कामं न क: कुर्यात्सिद्धिस्त्रैवर्गिक यत: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
एष:—यह; ते—तुम्हारी विनती; अहम्—मैं; विधास्यामि—सम्पन्न करूँगा; प्रियम्—अत्यन्त प्रिय; भीरु—हे डरी हुई; यत्— जो; इच्छसि—तुम चाह रही हो; तस्या:—उसकी; कामम्—इच्छाएँ; न—नहीं; क:—कौन; कुर्यात्—करेगा; सिद्धि:—मुक्ति की सिद्धि; त्रैवर्गिकी—तीन; यत:—जिससे ।.
 
अनुवाद
 
 हे भीरु, तुम्हें जो भी इच्छा प्रिय हो उसे मैं तुरन्त तृप्त करूँगा, क्योंकि तुम्हारे अतिरिक्त मुक्ति की तीन सिद्धियों का स्रोत और कौन है?
 
तात्पर्य
 मुक्ति की तीन सिद्धियाँ हैं—धर्म, अर्थ तथा काम। बद्धात्मा के लिए स्त्री को मुक्ति का स्रोत माना जाता है, क्योंकि वह अपने पति की चरम मुक्ति के लिए उसकी सेवा करती है। बद्ध भौतिक जगत इन्द्रियतृप्ति पर आधारित है और यदि सौभाग्यवश किसी को अच्छी पत्नी मिल जाती है, तो उसे सभी प्रकार से अपनी पत्नी की सहायता प्राप्त होती है। यदि वह अपने बद्धजीवन में विचलित होता रहता है, तो वह भौतिक कल्मष में अधिकाधिक फँसता जाता है। एक आज्ञाकारिणी पत्नी से उम्मीद की जाती है कि वह अपने पति की समस्त भौतिक इच्छाओं को पूरा करने में सहयोग करे जिससे वह सारे सुख जुटा सके और जीवनसिद्धि के लिए आध्यात्मिक कार्य सम्पन्न कर सके। किन्तु यदि पति आध्यात्मिक उन्नति में प्रगतिशील है, तो उसकी पत्नी निश्चय ही उसके कार्यों में हाथ बँटाती है और तब पति-पत्नी दोनों ही आध्यात्मिक सिद्धि से लाभ उठाते हैं। इसलिए यह अत्यावश्यक है कि बालिकाओं तथा बालकों को आध्यात्मिक कर्तव्य करने के लिए प्रशिक्षित किया जाय जिससे सहयोग की आवश्यकता उपस्थित होने पर दोनों लाभान्वित हो सकें। बालक का प्रशिक्षण ब्रह्मचर्य है और बालिका का कौमार्य। आज्ञाकारिणी पत्नी तथा अध्यात्मशिक्षित ब्रह्मचारी मानव उद्देश्य की प्रगति के लिए उत्तम संयोग है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥