श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 14: संध्या समय दिति का गर्भ-धारण  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक
अथापि काममेतं ते प्रजात्यै करवाण्यलम् ।
यथा मां नातिरोचन्ति मुहूर्तं प्रतिपालय ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
अथ अपि—यद्यपि (यह सम्भव नहीं है); कामम्—यह कामेच्छा; एतम्—जैसी है; ते—तुम्हारा; प्रजात्यै—सन्तानों के लिए; करवाणि—मुझे करने दें; अलम्—बिना विलम्ब किये; यथा—जिस तरह; माम्—मुझको; न—नहीं; अतिरोचन्ति—निन्दा करें; मुहूर्तम्—कुछ क्षण; प्रतिपालय—प्रतीक्षा करो ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि मैं तुम्हारे ऋण से उऋण नहीं हो सकता, किन्तु मैं सन्तान उत्पन्न करने के लिए तुम्हारी कामेच्छा को तुरन्त तुष्ट करूँगा। किन्तु तुम केवल कुछ क्षणों तक प्रतीक्षा करो जिससे अन्य लोग मेरी भर्त्सना न कर सकें।
 
तात्पर्य
 भले ही स्त्रीवश्य पति अपनी पत्नी से प्राप्त होने वाले सारे लाभों का ऋण चुका पाने में समर्थ न हो, किन्तु जहाँ तक कामेच्छा की पूर्ति द्वारा सन्तान उत्पन्न करने की बात है, किसी भी पति के लिए यह तनिक भी कठिन नहीं है जब तक कि वह नितान्त नपुंसक न हो। सामान्य परिस्थितियों में पति के लिए यह बहुत ही आसान कार्य है। अत्यन्त उत्सुक होने पर भी कश्यप ने अपनी पत्नी से कुछ क्षणों तक प्रतीक्षा करने के लिए कहा जिससे अन्य लोग उसकी निन्दा न कर सकें। वे अपनी स्थिति की व्याख्या इस प्रकार करते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥