श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 14: संध्या समय दिति का गर्भ-धारण  »  श्लोक 37

 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
स्वसर्गस्याशिषं लोक्यामाशासानां प्रवेपतीम् ।
निवृत्तसन्ध्यानियमो भार्यामाह प्रजापति: ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—महर्षि मैत्रेय ने कहा; स्व-सर्गस्य—अपनी ही सन्तानों का; आशिषम्—कल्याण; लोक्याम्—संसार में; आशासानाम्—इच्छा करते हुए; प्रवेपतीम्—काँपते हुए; निवृत्त—टाल दिया; सन्ध्या-नियम:—संध्याकालीन विधि-विधान; भार्याम्—पत्नी से; आह—कहा; प्रजापति:—जनक ।.
 
अनुवाद
 
 मैत्रेय ने कहा : तब महर्षि कश्यप ने अपनी पत्नी को सम्बोधित किया जो इस भय से काँप रही थी कि उसके पति का अपमान हुआ है। वह समझ गई कि उन्हें संध्याकालीन प्रार्थना करने के नैत्यिक कर्म से विरत होना पड़ा है, फिर भी वह संसार में अपनी सन्तानों का कल्याण चाहती थी।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥