श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 14: संध्या समय दिति का गर्भ-धारण  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
श्रद्दधानाय भक्ताय ब्रूहि तज्जन्मविस्तरम् ।
ऋषे न तृप्यति मन: परं कौतूहलं हि मे ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
श्रद्दधानाय—श्रद्धावान पुरुष के लिए; भक्ताय—भक्त के लिए; ब्रूहि—कृपया बतलाएँ; तत्—उसका; जन्म—आविर्भाव; विस्तरम्—विस्तार से; ऋषे—हे ऋषि; न—नहीं; तृप्यति—सन्तुष्ट होता है; मन:—मन; परम्—अत्यधिक; कौतूहलम्— जिज्ञासु; हि—निश्चय ही; मे—मेरा ।.
 
अनुवाद
 
 मेरा मन अत्यधिक जिज्ञासु बन चुका है, अतएव भगवान् के आविर्भाव की कथा सुन कर मुझे तुष्टि नहीं हो रही है। इसलिए आप इस श्रद्धावान् भक्त से और अधिक कहें।
 
तात्पर्य
 जो वास्तव में श्रद्धावान् तथा जिज्ञासु होता है, वही भगवान् के आविर्भाव तथा तिरोभाव की दिव्य
लीलाएँ सुनने के लिए सुपात्र है। विदुर ऐसे दिव्य सन्देशों को ग्रहण करने के उपयुक्त पात्र थे।
 
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥