श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 14: संध्या समय दिति का गर्भ-धारण  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक
प्राणिनां हन्यमानानां दीनानामकृतागसाम् ।
स्त्रीणां निगृह्यमाणानां कोपितेषु महात्मसु ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
प्राणिनाम्—जब जीवों का; हन्यमानानाम्—मारे जाते हुए; दीनानाम्—दीनों का; अकृत-आगसाम्—निर्दोषों का; स्त्रीणाम्— स्त्रियों का; निगृह्यमाणानाम्—सताये जाते हुओं का; कोपितेषु—क्रुद्ध हुओं का; महात्मसु—महात्माओं का ।.
 
अनुवाद
 
 वे दीन, निर्दोष जीवों का वध करेंगे, स्त्रियों को सताएँगे तथा महात्माओं को क्रोधित करेंगे।
 
तात्पर्य
 जब दीन निर्दोष जीवों का वध किया जाता है, स्त्रियों को सताया जाता है तथा कृष्णभावनामृत में लगे महात्माओं को क्रोधित किया जाता है, तो आसुरी कार्यों की प्रधानता होती है। आसुरी समाज में जीभ की तुष्टि के लिए दीन पशुओं की हत्या की जाती है तथा स्त्रियों को अनावश्यक यौन लिप्तता द्वारा सताया जाता है। जहाँ पर स्त्रियाँ तथा मांस हों वहाँ पर सुरा तथा यौन लिप्तता भी अवश्य होगी। जब समाज में इनकी प्रधानता होती है, तो या तो स्वयं भगवान् या उनके प्रामाणिक प्रतिनिधि द्वारा सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन होने की अपेक्षा की जाती है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥