श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 14: संध्या समय दिति का गर्भ-धारण  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक
तदा विश्वेश्वर: क्रुद्धो भगवाल्लोकभावन: ।
हनिष्यत्यवतीर्यासौ यथाद्रीन् शतपर्वधृक् ॥ ४१ ॥
 
शब्दार्थ
तदा—उस समय; विश्व-ईश्वर:—ब्रह्माण्ड के स्वामी; क्रुद्ध:—अतीव क्रोध में; भगवान्—भगवान्; लोक-भावन:—सामान्य जनों का कल्याण चाहने वाले; हनिष्यति—वध करेगा; अवतीर्य—स्वयं अवतरित होकर; असौ—वह; यथा—मानो; अद्रीन्— पर्वतों को; शत-पर्व-धृक्—वज्र का नियन्ता (इन्द्र) ।.
 
अनुवाद
 
 उस समय ब्रह्माण्ड के स्वामी पुरुषोत्तम भगवान् जो कि समस्त जीवों के हितैषी हैं अवतरित होंगे और उनका इस तरह वध करेंगे जिस तरह इन्द्र अपने वज्र से पर्वतों को ध्वस्त कर देता है।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता (४.८) में कहा गया है; भगवान् भक्तों का उद्धार करने तथा दुष्टों का वध करने के लिए अवतार रूप में आते हैं। ब्रह्माण्ड तथा सबों के स्वामी दिति के पुत्रों का वध करने के लिए प्रकट होंगे, क्योंकि वे भगवद्भक्तों का अपमान करेंगे। भगवान् के अनेक अभिकर्ता हैं यथा इन्द्र, चन्द्र, वरुण, देवी दुर्गा तथा काली जो संसार के किसी भी भयानक दुष्ट को दण्ड दे सकते हैं। वज्र द्वारा पर्वतों के ध्वस्त किये जाने का दृष्टान्त अति उपयुक्त है। ब्रह्माण्ड में, पर्वत को सबसे सुदृढ़ निर्मित वस्तु माना जाता है फिर भी भगवान् की व्यवस्था द्वारा इसे आसानी से ध्वस्त किया जा सकता है। भगवान् को किसी सुदृढ़ निर्मित वस्तु का संहार करने के लिए अवतरित होने की आवश्यकता नहीं है, वे तो केवल अपने भक्तों के हेतु आते हैं। हर व्यक्ति को प्रकृति द्वारा प्रदत्त कष्टों को भोगना पड़ता है, किन्तु दुष्टों के कार्य यथा निर्दोष लोगों तथा पशुओं का वध या स्त्रियों का सताया जाना हर एक के लिए हानिकारक है, अत: वे भक्तों के लिए पीड़ा का स्रोत बनते हैं, इसलिए भगवान् अवतरित होते हैं। वे अपने उत्कट भक्तों को राहत देने के लिए ही अवतरित होते हैं। भगवान् द्वारा दुष्ट का वध भी उस दुष्ट के प्रति भगवान् की कृपा है यद्यपि बाह्यत: भगवान् भक्त का ही पक्ष लेते हैं। चूँकि भगवान् सर्वोच्च हैं, अतएव दुष्टों का वध करने तथा भक्तों का पक्ष लेने के उन के कार्यों में कोई भेद नहीं है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥