श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 14: संध्या समय दिति का गर्भ-धारण  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक
स वै महाभागवतो महात्मा
महानुभावो महतां महिष्ठ: ।
प्रवृद्धभक्त्या ह्यनुभाविताशये
निवेश्य वैकुण्ठमिमं विहास्यति ॥ ४८ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; वै—निश्चय ही; महा-भागवत:—सर्वोच्च भक्त; महा-आत्मा—विशाल बुद्धि; महा-अनुभाव:—विशाल प्रभाव; महताम्—महात्माओं का; महिष्ठ:—सर्वोच्च; प्रवृद्ध—पूर्णतया प्रौढ़; भक्त्या—भक्ति से; हि—निश्चय ही; अनुभावित—भाव की अनुभाव दशा को प्राप्त; आशये—मन में; निवेश्य—प्रवेश करके; वैकुण्ठम्—आध्यात्मिक आकाश में; इमम्—इसको (भौतिक जगत) को; विहास्यति—छोड़ देगा ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् का सर्वोच्च भक्त विशाल बुद्धि तथा विशाल प्रभाव वाला होगा और महात्माओं में सबसे महान् होगा। परिपक्व भक्तियोग के कारण वह निश्चय ही दिव्य भाव में स्थित होगा और इस संसार को छोडऩे पर वैकुण्ठ में प्रवेश करेगा।
 
तात्पर्य
 भक्तियोग में दिव्य प्रगति की तीन अवस्थाएँ हैं, जिन्हें स्थायी भाव, अनुभाव तथा महाभाव कहा जाता है। निरन्तर पूर्ण भगवत्प्रेम स्थायी-भाव कहलाता है और जब यह किसी विशेष दिव्य सम्बन्ध में सम्पन्न किया जाता है, तो अनुभाव कहलाता है। किन्तु महाभाव की अवस्था भगवान् की निजी ह्लादिनी शक्ति के मध्य ही दृष्टिगोचर होती है। ऐसा समझा जाता है कि दिति का पौत्र अर्थात् प्रह्लाद महाराज निरन्तर भगवान् का ध्यान करेगा और उनके कार्यकलापों का बारम्बार कथन करेगा। ध्यान में निरन्तर व्यस्त रहने के कारण वह अपना भौतिक शरीर त्याग कर वैकुण्ठलोक चला जायेगा। अब भी ऐसा ध्यान भगवान् के नाम के कीर्तन तथा श्रवण द्वारा अधिक सुविधापूर्वक सम्पन्न किया जाता है। इस कलियुग के लिए इसकी विशेष रूप से संस्तुति की जाती है।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥