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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 14: संध्या समय दिति का गर्भ-धारण  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  3.14.51 
मैत्रेय उवाच
श्रुत्वा भागवतं पौत्रममोदत दितिर्भृशम् ।
पुत्रयोश्च वधं कृष्णाद्विदित्वासीन्महामना: ॥ ५१ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—मैत्रेय मुनि ने कहा; श्रुत्वा—सुनकर; भागवतम्—भगवान् के महान् भक्त होने के लिए; पौत्रम्—पौत्र को; अमोदत—आनन्द का अनुभव किया; दिति:—दिति ने; भृशम्—अत्यधिक; पुत्रयो:—दोनों पुत्रों का; —भी; वधम्—वध; कृष्णात्—कृष्ण द्वारा; विदित्वा—जानकर; आसीत्—हो गई; महा-मना:—मन में अतीव हर्षित ।.
 
अनुवाद
 
 मैत्रेय मुनि ने कहा : यह सुनकर कि उसका पौत्र महान् भक्त होगा और उसके पुत्र भगवान् कृष्ण द्वारा मारे जायेंगे, दिति मन में अत्यधिक हर्षित हुई।
 
तात्पर्य
 दिति यह जानकर अतीव खिन्न थी कि उसके असामयिक गर्भधारण से उसके पुत्र असुर होंगे और वे भगवान् से युद्ध करेंगे। किन्तु जब उसने सुना कि उसका पौत्र महान् भक्त होगा और उसके दोनों पुत्र भगवान् द्वारा मारे जायेंगे तो वह अतीव तुष्ट हो गई। एक महान ऋषि की पत्नी तथा महान् प्रजापति दक्ष की पुत्री होने के नाते वह जानती थी कि भगवान् द्वारा मारा जाना परम सौभाग्य है। चूँकि भगवान् परम पूर्ण हैं, अतएव उनके हिंसा तथा अहिंसा दोनों कार्य परम स्तर पर होते हैं। भगवान् के ऐसे कार्यों में कोई अन्तर नहीं होता। संसारी हिंसा तथा अहिंसा का भगवान् के कार्यों से कोई सरोकार नहीं होता। उनके द्वारा मारा गया असुर वही फल प्राप्त करता है जितना वह भक्त जो अनेकानेक जन्मों की तपस्या के बाद मोक्ष प्राप्त करता है। यहाँ पर भृशम् शब्द सार्थक है, क्योंकि यह सूचित करता है कि दिति अपनी अपेक्षाओं से भी अधिक हर्षित थी।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध के अन्तर्गत “संध्या समय दिति का गर्भधारण” नामक चौदहवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
 
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